Pola festival : बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेवाला ‘बैलपोला’
बैलपोले का दिन बैलों के प्रति किसानों की कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है और हम भारतीय ‘पोला’ उत्सव के अवसर पर इस कृतज्ञता को निरंतर विकसित करते आ रहे हैं। भारतीय संस्कृति मनुष्य के साथ-साथ प्रकृति और पशुओं की भी पूजा करना सिखाती है। हाल ही में सरकार को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि निजीकरण और वैश्वीकरण की आड़ में पशुपालकों के साथ कृषक वर्ग भी राष्ट्रीय संकट का सामना कर रहा है। इसलिए उनका आए दिन डिप्रेशन और आत्महत्या करना ठीक नहीं है। यह नहीं भुलाया जा सकता कि अगर जीवन देनेवाला ही जीवित नहीं रहेगा तो एक दिन स्वदेशी पर गर्व करनेवाले भारतीयों के लिए विदेशी भोजन के बिना रहना मुश्किल हो जाएगा।
‘पोला’ (Pola festival) यह त्योहार श्रावण माह में पिठोरी अमावस्या के दिन पड़ता है। इस महीने के शुरू होते ही कई त्योहार और उत्सव शुरू हो जाते हैं। इस वक्त बरसात होने से सृष्टि की सुंदरता प्रकट होती है। ऐसे इस श्रावण में नागपंचमी, नारली पूर्णिमा, रक्षाबंधन, गोकुलाष्टमी जैसे त्योहारों के बाद अंत में श्रावण में बैलपोले का त्योहार आता है। पूरे महाराष्ट्र में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जानेवाला सर्जा-राजा का त्योहार ‘पोला’ है। पोले का त्योहार किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। शहर से लेकर गांव तक इस त्योहार की धूम रहती है। लेकिन इस त्यौहार का विशेष आकर्षण गांवों में देखने को मिलता है। इस दिन बैल की पूजा की जाती है, जो साल भर खेतों में मेहनत करता है और किसानों को खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मदद करता है, उसके हम पर अनंत उपकार हैं।
जिन लोगों के घरो में बैलों की जोड़ी नहीं होती वे भी मिट्टी और लकड़ी के बैलों की पूजा करते हैं। बैलपोले का यह उत्सव कृषि पर आधारित है और यह उत्सव हमारे बैलों और खेत-खलिहान के प्राणीयो के महत्व के बारे में बताता है। यह त्यौहार हमें यह एहसास कराता है कि प्रकृति, मनुष्य और सभी प्राणिमात्राओ में भगवान हैं और उनकी पूजा ही भगवान की पूजा है। पोले के दौरान किसान खेतों में बैल नहीं चराते और उस दिन महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में स्कूल बंद रहते हैं। पोला यह एक ऐसा त्योहार है जिसका संभाल हजारों वर्षों से विशेष रूप से पशुपालक किसानों द्वारा किया जाता रहा है। पशुपालन अवस्था के बाद कृषि अवस्था में आये प्राचीन मानव समुदाय का यह पर्व है। यह उस श्रमिक संस्कृति का प्रतीक है जो ज़मीन और रोटी के लिए कड़ी मेहनत करते है। किसान और खेत मजदूर का सच्चा साथी बैल ही है। इन तीन कारकों की परस्पर क्रिया भोजन के साथ-साथ देश की आय सृजन का मुख्य आधार बनती है।
अपना बैल उठ कर अलग दिखाने के लिए किसान उसके लिए जितना संभव हो उतना आभूषण खरीदते हैं। बैलों को सजाया जाता है और पोले के जुलूस में भाग लिया जाता है। गांव की सीमा के पास खेत में आम के पत्तों का एक विशाल तोरण बनाया जाता है। इस त्यौहार के दिन महाराष्ट्र के गांवों में हर घर में आम के पत्तों से सजावट की जाती है और उसके पास सभी बैल, जंत्री, शहनाई, ढोल, ताशे को एक साथ लाया जाता है। इस समय ‘झडत्या’ कहने की प्रथा है, फिर गांव में सम्मानित व्यक्ति, गांव का पाटील या कोई अमीर जमींदार तोरण तोड़ता है और पोला छूट जाता है फिर बैलों को हनुमानजी के मंदिर में ले जाते है और फिर घर ले जाकर उसकी पूजा करते है। बैल ले जानेवाले को ‘बोजारा’ दिया जाता है, यह त्यौहार किसानों के बीच महत्वपूर्ण माना जाता है। इस त्यौहार को लेकर किसानों के बीच विशेष उत्साह और खुशी का माहौल रहता है।
गांव का किसान सुबह से ही बैलपोले की तैयारी शुरू कर देता है। इस दिन किसान सबसे पहले सुबह उठकर बैलों की गर्दन और नाक से रस्सियाँ निकालते हैं। इस दिन किसान और उनके परिवार बैलों को नहलाते हैं, उनके सींगों को रंगते हैं, पुरानी रस्सियों को नई रस्सियों से बदलते हैं, नई घंटियाँ बांधकर उन्हें सजाते है इसके बाद उनका श्रृंगार कर उनकी पूजा भी की जाती है। इस दिन बैल के कंधे को हल्दी और घी या तेल से शिकाई की जाती है। बैल की पीठ पर कढ़ा हुआ झूल, पूरे शरीर पर गेरू के धब्बे, सींगों पर बेगड़, सिर पर केश, गले में कॉलर और घंटियों के हार, नए कपड़े, चांदी और तांबे की रस्सियों के साथ नया कसारा पैर और सुग्रास भोजन उसे देते हैं। कुछ स्थानों पर बाजरे की खिचड़ी भी बैलों को खिलाई जाती है। शाम के समय गाँव के सभी लोग अपने बैलों के साथ गाँव के खुले चौराहे पर एकत्र होते हैं। बैलपोले का दिन किसानों और खेतों में काम करनेवाले बैलों और अन्य सभी प्राणीयो के लिए आराम का दिन होता है, इसलिए इस दिन कोई काम नहीं किया जाता है। इसके बाद शाम के समय घर की महिलाएं अपने-अपने बैलों की आरती उतारकर उनकी पूजा करती हैं। ढोल-नगाड़ों की ध्वनि के साथ उनका जुलूस निकाला जाता है। घर की महिलाएं स्वादिष्ट व्यंजन, पूरनपोली और शिरा बनाती हैं और बैलों को पूरनपोली खिलाती हैं। बैल की देखभाल करनेवाले ‘बैलकरी’ को नए कपड़े दिए जाते हैं।
जब कोई धर्म अस्तित्व में नहीं था तब से ही बैलपूजा प्राचीन भारतीय मानव समुदाय द्वारा उस समय से की जाती थी यह सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से साबित हुआ है। पोला पर्व को श्रम के प्रतीक बैल के प्रति वर्ष भर कार्य करते हुए उसके प्रति कृतज्ञता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा आज भी ग्रामीण जीवन में चल रही है। हालाँकि हाल ही में कृषि कार्य ट्रैक्टरों द्वारा किया जाने लगा है, लेकिन लोगों के मन में बैल का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। वर्ष भर किसानों का साथी बनकर रहनेवाले इन बैलों की अपार मेहनत से देश के सभी लोगों को रोजगार, अनाज और भोजन मिलता है। लेकिन इस त्यौहार के अवसर पर पलास के पेड़ों की टहनियों को दरवाजे के सामने, नांद में, खेतों में रखने की परंपरा है और इस दिन लाखों पेड़ काटे जाते हैं। जब बेमौसम बारिश और सूखे जैसी प्रकृति की मार के कारण किसानों और चरवाहों का जीवन पहले ही समाप्त हो चुका है, तो ऐसे त्योहारों के अवसर पर पेड़ों की कटाई उचित नहीं है। पर्यावरण के इस व्यापक विनाश को रोका जाना चाहिए।
खून का पानी करनेवाला किसान आत्महत्या करता है, भूखा सोता है वहीं इस मंदिर में देव-धर्म का मजाक उड़ानेवाला पुजारी, पुरोहित, पंडित चैन से घी खाता है, यह वास्तव इस देश की त्रासदी है। इस देश में गाय को गोमाता तो माना जाता है, लेकिन बैल को पिता नहीं माना जाता। लेकिन मंदिर में दान करने के लिए हमें गाय की नहीं, बल्कि नंदी बैल की प्रतिकृति की आवश्यकता होती है। यदि इस विसंगति के पोषक लोग संस्कृति और धर्म के संरक्षक बन जाते हैं और मनुष्य की मृत्यु तक पहुंच जाते हैं, तो जब तक हमारे शरीर पर अपना सिर और अपना मस्तिष्क नहीं होगा, तब तक हम सच्ची संस्कृति और सच्चे धर्म की सच्चाई नहीं जान पाएंगे। बिना परिश्रम के व्यक्ति के लिए और बैल के बिना खेती कि लिए कोई विकल्प नहीं है, सभी को बैल पोले की तहे दिल से शुभकामनाएँ !

- प्रविण बागडे, नागपूर

