भंडारा जिले में 241 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे, 700 पद रिक्त विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य पर संकट
भंडारा : केंद्र सरकार की ‘यू-डायस प्लस’ रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में एक-शिक्षकीय स्कूलों की संख्या बढ़कर 9,000 के पार पहुंच गई है। शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में राज्य भर में ऐसे स्कूलों की संख्या में 1,944 का इजाफा हुआ है। इस स्थिति में भंडारा जिले का हाल भी बेहद चिंताजनक है, जहां करीब 241 प्राथमिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं। ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में कार्यरत शिक्षकों को अध्यापन के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य भी संभालने पड़ रहे हैं, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।जिले में जिला परिषद के कुल 714 स्कूलों में से 241 स्कूल एक-शिक्षकीय, 238 स्कूल दो-शिक्षकीय और 50 स्कूल शून्य-शिक्षकीय (बिना शिक्षक) हैं। जिले में वर्तमान में शिक्षकों के लगभग 700 पद खाली पड़े हैं।

वहीं, हर महीने करीब 30 शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिससे यह समस्या और गहराती जा रही है। शिक्षक भर्ती की मांग को लेकर जन-प्रतिनिधियों और स्थानीय संगठनों ने कई बार आंदोलन किए हैं, लेकिन स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है।शिक्षकों की कमी के कारण एक ही कमरे में पहली से चौथी कक्षा तक के विद्यार्थियों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। एक कक्षा को पढ़ाते समय अन्य कक्षाओं के छात्रों का ध्यान भटकता है, जिससे पढ़ाई का मूल उद्देश्य ही विफल हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन सुविधा और नेटवर्क की कमी के चलते शिक्षकों को प्रतिदिन भारी मशक्कत करनी पड़ती है। सुविधाओं के अभाव में गरीब परिवारों के बच्चों को गुणवत्ताहीन शिक्षा के भरोसे छोड़ दिया गया है, जिससे अभिभावकों में गहरा असंतोष है।शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत पहली से पांचवीं कक्षा के लिए प्रति 30 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक और छठी से आठवीं कक्षा के लिए प्रति 35 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक का होना अनिवार्य है। हालांकि, जिले में इस कानून और नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ग्रामीण इलाकों में समय पर पदभर्ती न होना, अंतर-जिला तबादले और कम छात्र संख्या का बहाना बनाकर नए शिक्षकों की नियुक्ति में टालमटोल करना इस संकट के प्रमुख कारण बने हुए हैं।

