जिले की 148 ग्राम पंचायतों में अधिकारों के अभाव में विकास कार्यों पर लगा ‘ब्रेक
”हम केवल नाम के प्रशासक’: बारिश के मौसम में अति-आवश्यक कार्यों पर असर पड़ने से ग्रामीण परेशान
भंडारा: जिले की कार्यकाल समाप्त हो चुकीं 148 ग्राम पंचायतों का कामकाज फिलहाल प्रशासकों के जरिए चलाया जा रहा है। हालांकि, प्रशासक के रूप में नियुक्त मौजूदा सरपंचों को वित्तीय और नीतिगत (पॉलिसी) अधिकार न मिलने के कारण ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य पूरी तरह से ठप हो गए हैं। अदालत के आदेशानुसार सरपंचों को प्रशासक पद तो सौंप दिया गया है, लेकिन उनके पास केवल दैनिक कामकाज तक ही सीमित अधिकार होने के कारण विकास प्रक्रिया पर बड़ा ब्रेक लग गया है।फरवरी 2026 में इन ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, चुनाव होने तक निवर्तमान सरपंचों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्त किया गया था। मार्च महीने में इस संबंध में औपचारिक आदेश भी जारी किए गए थे। लेकिन प्रशासक बने सरपंचों को केवल बिजली, जलापूर्ति और स्वच्छता जैसे नियमित कार्यों की देखरेख तक सीमित अधिकार दिए गए हैं। नए विकास कार्यों को मंजूरी देने, फंड खर्च करने या नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार न होने से कई ग्राम पंचायतें वित्तीय संकट में फंस गई हैं।अधिकारों के अभाव में ठेकेदारों के बिल अटक गए हैं, जिससे ग्राम पंचायत और ठेकेदारों के बीच विवाद की स्थिति बनने लगी है। सड़कों की मरम्मत, नालियों की सफाई, कीटनाशक (धुआं) छिड़काव और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधाएं आ रही हैं, जिससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। कुल मिलाकर, जिम्मेदारी मिलने के बावजूद अधिकार न होने से जिले की 148 ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों पर बुरा असर पड़ा है। शासन से प्रशासक सरपंचों को तुरंत वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार प्रदान करने की मांग जोर पकड़ रही है।पाबंदियों के कारण मरम्मत के बिल निकालना असंभवअतिवृष्टि के कारण भंडारा पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों की सीमाओं में कई सड़कों की हालत जर्जर हो चुकी है। जगह-जगह बड़े गड्ढे हो गए हैं, कुछ घरों में पानी घुस गया है तथा स्कूल परिसरों को भी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, अधिकारों पर लगी पाबंदियों की वजह से इन आवश्यक मरम्मत कार्यों के बिल निकालना संभव नहीं हो पा रहा है, जिससे आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।समान अधिकार देने की मांगजिन ग्राम पंचायतों में सरकारी अधिकारियों को प्रशासक के रूप में नियुक्त किया गया है, वहां वित्तीय लेन-देन सुचारू रूप से चल रहे हैं। इससे जनप्रतिनिधियों के बीच भेदभाव की भावना पैदा हो रही है। यही वजह है कि प्रशासक बने सरपंचों को भी सरकारी प्रशासकों के समान अधिकार देने की मांग अब तूल पकड़ रही है।
“प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी तो दे दी गई है, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार न होने के कारण कई अति-आवश्यक कार्य नहीं हो पा रहे हैं। बारिश के मौसम में धुआं छिड़काव, सड़कों की मरम्मत और स्वच्छता जैसे आपातकालीन कार्य भी अटके पड़े हैं। इसलिए हम केवल नाम के प्रशासक बनकर रह गए हैं। सरकार को तुरंत आवश्यक अधिकार देने चाहिए।”— मेघा उईके, प्रशासक सरपंच, चांदोरी।

