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तीन राज्यों को जोड़ने वाला आमगांव-चांदसूरज मार्ग बदहाल

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सालेकसा :
महाराष्ट्र के पूर्वी छोर पर स्थित राज्य आमगांव-सालेकसा-चांदसुरज राजमार्ग क्रमांक ३३५ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है. लेकिन पिछले कई वर्षों से इस सड़क की हालत पूरी तरह जर्जर हो गई है. आमगांव से सालेकसा के बीच लगभग हर कदम पर बड़े-बड़े गड्ढे नजर आते हैं, जिससे नागरिकों को रोजाना जान जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ रही है. लगभग हर दिन एक-दो दुर्घटनाएं होने की खबरें मिलती हैं और आठ-दस दिन के भीतर गंभीर दुर्घटनाएं भी सामने आती रहती हैं. पिछले दस-पंद्रह वर्षों में इस मार्ग पर कई यात्रियों की असामयिक मृत्यु भी हो चुकी है, लेकिन अब तक सड़क मरम्मत की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
चांदसूरज मार्ग पर बाघ नदी पर बना पुल पूरी तरह कमजोर हो चुका है. सुरक्षा की दृष्टि से भारी वाहनों की आवाजाही इस पुल पर रोक दी गई है, जिसके चलते महाराष्ट्र राज्य परिवहन महामंडल ने रोंड़ा से झालिया तक की बस सेवाएं बंद कर दी हैं. इसका सीधा असर महिलाओं, छात्रों, बुजुर्गों व रोजाना यात्रा करने वाले नागरिकों पर पड़ा है. छोटे वाहन व दोपहिया चालकों को मजबूरी में इसी मार्ग से गुजरना पड़ता है. लेकिन गड्डों से भरे इस मार्ग पर यात्रा करना किसी खतरे से कम नहीं है. नागरिक जब संबंधित विभाग से गड्डों की मरम्मत की मांग करते हैं, तो विभागीय अधिकारी निधि उपलब्ध न होने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, जिससे लोगों में तीव्र आक्रोश है.
सालेकसा तहसील मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सीमा पर नक्सल प्रभावित, आदिवासी बहुल तथा अत्यंत दुर्गम क्षेत्र है. ऐसे क्षेत्रों में सड़कें नागरिकों के लिए जीवनरेखा होती हैं. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले ४० वर्षों से इस राज्य मार्ग के जीणर्णोद्धार पर किसी भी सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई. झलिया से पानगांव तक सड़क की हालत इतनी खराब है कि वाहन चलाना लगभग असंभव हो चुका है. हाजराफाल घाट से गणेश मंदिर ढलान तक की सड़कें बड़े गड्डों में तब्दील हो चुकी हैं.
विदर्भ का प्रसिद्ध हाजरफाल पर्यटन स्थल इसी मार्ग पर स्थित है. यहां हर वर्ष हजारों पर्यटक आते हैं और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है. लेकिन सड़क की बदहाली के कारण पर्यटकों की संख्या में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है. इसी तरह आदिवासी समुदाय का प्रसिद्ध तीर्थस्थल कचारगढ़ भी इसी मार्ग पर स्थित है, जहां फरवरी में लाखों श्रद्धालु महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से पैदल एवं वाहनों से पहुंचते हैं. पिछले पांच वर्षों से जर्जर मार्ग के कारण श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिससे कई बार उनकी सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हुए हैं.

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