सम्राट अशोक : तलवार से धम्म तक, मानवता के इतिहास की अद्वितीय यात्रा
भारतीय इतिहास में अनेक राजाओं का उल्लेख मिलता है। कुछ ने विशाल साम्राज्य स्थापित किए, कुछ ने युद्धों में विजय प्राप्त की, तो कुछ ने अपार वैभव और संपत्ति अर्जित की। लेकिन इतिहास में ऐसे बहुत कम शासक हुए हैं जिन्होंने युद्ध जीतने के बाद युद्ध का त्याग किया और सत्ता के शिखर पर होते हुए भी मानवता का मार्ग अपनाया। ऐसे ही अद्वितीय व्यक्तित्व थे सम्राट अशोक, जिन्हें इतिहास ‘अशोक महान’ के नाम से जानता है। वे केवल एक पराक्रमी राजा ही नहीं, बल्कि करुणा, दया और मानवता का संदेश देने वाले महान शासक भी थे। उनकी जयंती के अवसर पर उनके जीवन, विचार और धम्मनीति पर चिंतन करना आज भी समाज को नई दिशा दे सकता है। सम्राट अशोक, बिंदुसार के पुत्र और महान चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र थे। मौर्य साम्राज्य पहले से ही विस्तृत था, किंतु अशोक के शासनकाल में उसका अभूतपूर्व विस्तार हुआ। अपने प्रारंभिक काल में वे एक कठोर, दृढ़ और पराक्रमी योद्धा के रूप में प्रसिद्ध थे। सत्ता को सुदृढ़ बनाने के लिए उन्होंने अनेक युद्ध लड़े। परंतु उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ था कलिंग युद्ध, जिसने न केवल उनके जीवन को बदला, बल्कि इतिहास की दिशा भी बदल दी।
कलिंग (वर्तमान ओडिशा) पर विजय प्राप्त करने के लिए हुए इस भीषण युद्ध में लाखों लोग मारे गए, हजारों घायल हुए और असंख्य परिवार उजड़ गए। रणभूमि पर बिखरी लाशें, विधवाओं का विलाप और अनाथ बच्चों की पीड़ा ने अशोक के हृदय को झकझोर दिया। कहा जाता है कि उसी क्षण उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया ‘क्या इस विजय की कीमत इतनी भयावह होनी चाहिए?’ यही प्रश्न उनके जीवन के परिवर्तन का प्रारंभ बना। कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने हिंसा का मार्ग त्याग दिया और बौद्ध धर्म को अपनाया। उन्होंने ‘धम्म’ को अपने जीवन और शासन का आधार बनाया। धम्म केवल धार्मिक विचार नहीं था, बल्कि वह दया, करुणा, अहिंसा, सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का व्यापक सिद्धांत था। युद्ध विजेता से मानवता के संदेशवाहक बनने तक का उनका यह परिवर्तन विश्व इतिहास में अद्वितीय माना जाता है।

अशोक ने अपने राज्य में धम्मनीति को लागू किया और अनेक जनकल्याणकारी कार्य किए। उन्होंने सड़कों के किनारे वृक्षारोपण करवाया, यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं, कुएँ खुदवाए और अस्पतालों की स्थापना की। यह उस समय के लिए अत्यंत प्रगतिशील और मानवीय दृष्टिकोण का परिचायक था। उन्होंने पशु हत्या पर नियंत्रण लगाया और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता दिखाई। उनके शिलालेखों में प्रजा के प्रति प्रेम, नैतिकता और कर्तव्य का स्पष्ट संदेश मिलता है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म और धम्म के संदेश को केवल भारत तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने धम्मदूतों को विभिन्न देशों में भेजा। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, नेपाल और अफगानिस्तान जैसे देशों में बौद्ध विचारों का प्रसार हुआ। उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार भारत की सांस्कृतिक पहचान विश्व स्तर पर स्थापित हुई।
अशोक ने अपने प्रशासन में नैतिकता को सर्वोच्च स्थान दिया। उन्होंने ‘धम्म महामात्र’ नामक अधिकारियों की नियुक्ति की, जो प्रजा के कल्याण और नैतिक जीवन को सुनिश्चित करते थे। उनके शासन का उद्देश्य केवल सत्ता बनाए रखना नहीं, बल्कि जनता के सुख और कल्याण को सुनिश्चित करना था। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है। आज भारत विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है, लेकिन सामाजिक तनाव, हिंसा और असहिष्णुता की घटनाएँ भी सामने आती रहती हैं। ऐसे समय में सम्राट अशोक की धम्मनीति हमें याद दिलाती है कि सत्ता से बड़ी मानवता होती है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची विजय तलवार से नहीं, बल्कि करुणा और प्रेम से प्राप्त होती है।
भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में भी अशोक की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। राष्ट्रीय प्रतीक ‘सारनाथ का सिंह स्तंभ’ उनके काल का है, और भारतीय ध्वज का अशोक चक्र उनके धम्मचक्र का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि आधुनिक भारत की मूल भावना में भी उनके विचारों की गूंज है।
आज जब विश्व में युद्ध, संघर्ष और राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं, तब सम्राट अशोक का जीवन हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। हिंसा से सत्ता प्राप्त की जा सकती है, लेकिन दिलों पर राज केवल मानवता से ही किया जा सकता है।सम्राट अशोक का जीवन शक्ति से शांति की ओर, युद्ध से करुणा की ओर और अहंकार से मानवता की ओर यात्रा का प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्होंने जो धम्म का मार्ग दिखाया, वह आज भी मानवता के लिए प्रकाशस्तंभ के समान है। उनकी जयंती पर हमें केवल उनके साम्राज्य को याद नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करना चाहिए।क्योंकि सच्चा महान शासक वही होता है, जो तलवार से नहीं, बल्कि मानवता से दुनिया को जीतता है। सम्राट अशोक को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजली!
- प्रवीण बागडे (नागपुर)
मो.क्र. ९९२३६२०९१९

