Tanha Pola : एक दूसरे के बीच स्नेहबंध निर्माण होना चाहिए ‘तान्हा पोला’
‘तान्हा पोला’ यह उत्सव नागपुरकर भोसले के शासन काल में शुरू हुआ था। विदर्भ में यह उत्सव लगभग सर्वत्र मनाया जाता है। 1789 में एक अन्य धनी राजा रघुजी महाराज भोसले (द्वितीय) ने इस उत्सव की शुरुआत की थी। उन्होंने छोटे बच्चों को बैलों का महत्व समझाने के लिए यह पहल की थी। राजा रघुजी महाराज भोसले ने लकड़ी के बैल बनवाकर सभी छोटे बच्चों को बाँटे। बैलों को जीवित बैलों की तरह सजाया गया था। एक आम का तोरण लगाया गया और उस पर जलेबी, फल, चॉकलेट, बिस्कुट और पूड़े जैसी विभिन्न वस्तुएँ रखी गईं। बच्चों को बैल के पास खड़ा करके बैलों की पूजा कराई गई। पूजा समाप्त होने के बाद, तोरण तोड़ा गया, पोला तोड़ा गया और खिड़की से हनुमान के दर्शन किए गए और जब हनुमान नारियल तोड़कर लौटे, तो बच्चों को भोजन, पैसे और भोजन बाँटा गया। यह परंपरा निरंतर चलती रही। आज भी इसे नागपुर के महल क्षेत्र में देखा जा सकता है।
नागपुर समेत विदर्भ के लगभग सभी जिलों में हर उम्र के लोग लकड़ी के बैल की पूजा कर इस त्योहार को खुशी के साथ मनाते हैं। नागपुर के सिनियर भोंसला महल में आठ फुट ऊंचा लकड़ी का बैल सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है। नागपुर में यह त्योहार और लकड़ी के बैल (तान्हा) उत्सव 235 साल पूरे कर रहा है। पोला को पूरे महाराष्ट्र में बैलों के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। पोला के दूसरे दिन यानी तान्हा पोला पर शहर के कई हिस्सों में लकड़ी के बैलों का पोले का आयोजन किया जाता हैं। विदर्भ के अलावा यह पोला कहीं और नहीं मनाया जाता।
छोटे बच्चे बड़े बैलों को नहीं उठा सकते। वे उन्हें वश में भी नहीं कर सकते। इसलिए उनके मनोरंजन के लिए ‘तान्हा पोला’ मनाया जाता है। उस दिन छोटे बच्चे लकड़ी का बना एक बैल लेते हैं और असली बैल की तरह ही इस लकड़ी के बैल का तान्हा पोला मनाते हैं। तान्हा पोला एक परंपरा है जो मुख्यतः छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए मनाई जाती है। बैल पोला पाड़वा के अवसर पर नागपुर और पूर्वी विदर्भ में तान्हा पोला उत्साह के साथ मनाया जाता है। पोला की इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत राजा रघुजी भोसले ने की थी। तब से तान्हा पोला मनाया जाता रहा है। पोले के दूसरे दिन मनाया जानेवाला तान्हा पोला शहर का एक अनूठा त्योहार है और विदर्भ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है।
इस दिन बच्चे अपने लकड़ी के बैलों को सजाते हैं। उसके बाद इस छोटे बैल को पास के किसी मंदिर या मैदान में तान्हा पोले का आयोजन किया जाता है। उस क्षेत्र को गुब्बारों, तोरण और झंडों से सजाया जाता है। इस अवसर पर महादेव के गीत बजाए जाते हैं। चूँकि नंदी बैल भगवान महादेव का वाहन है, इसलिए महादेव के नाम का जाप किया जाता है। उसके बाद बच्चों को खीरा और नारियल का उपहार दिया जाता है और यह घोषणा की जाती है कि पोला छुट गया है। पिछले कुछ वर्षों से यह बैल संस्कृति और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन गया है। कई माता-पिता अपने बच्चों को अलग-अलग वेशभूषा पहनाकर लाते हैं। पोला छुटने से पहले इन सभी बच्चों की वेशभूषा का निरीक्षण किया जाता है। साथ ही उनके द्वारा सजाए गए बैलों का भी निरीक्षण किया जाता है। पोला छुटने के बाद जिन बच्चों के पास सबसे अच्छी वेशभूषा और सबसे अच्छा सजाया हुआ बैल होता है, उन्हें उनकी संख्या के अनुसार नंबर देकर उचित पुरस्कार दिए जाते हैं। इसी तरह सभी बच्चों को कुछ ना कुछ छोटे छोटे उपहार दिए जाते हैं। उसके बाद ये बच्चे अपने अपने घर आ जाते हैं।
जिस तरह घर में सबसे पहले बड़े बैलों की पूजा की जाती है, उसी तरह इन लकड़ी के बैलों की पूजा भी घर से ही शुरू होती है। उसके बाद ये बच्चे अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों के पास जाकर ‘बोजारा’ इकट्ठा करते हैं, यानी उन्हें पैसे या उपहार दिए जाते हैं। छोटे बच्चों को भी कृषि और उसमें मेहनत करनेवाले बैलों का महत्व समझना चाहिए। शायद विदर्भ में तान्हा पोला मनाने की प्रथा हमारी कृषि संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही शुरू हुई है। इसी वजह से छोटे बच्चे भी बैल इस पशुधन के बारे में सीखते हैं और महाराष्ट्रीयन संस्कृति को संरक्षित करते हैं। तान्हा पोले की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ !
– प्रविण बागडे, नागपूर : 9923620919

